कभी मोहब्बत में इतने गुम हुआ करते थे,
तुझ से ही शुरू, तुझ ही पे ख़त्म हुआ करते थे।
ना दिन का पता होता, ना होती रात की ख़बर,
कितनी भी मुलाक़ातें हो जातीं, ना होता मुझ में सब्र।
कभी दूर हुए तो पास आने की होती मुझे तलब,
पास भी रहो तुम, फिर और पास होने की तलब।
पागलपन भी ऐसा कि दुनिया से मुझे मतलब नहीं,
लोगों की ना परवाह, ग़लत बात भी लगती सही।
दुआओं में हम… बस हम ही हुआ करते थे,
हर सजदे में नाम तुम्हारा ही लिया करते थे।
ख़्वाबों की गलियों में घर सा बना लिया था,
हर सोच के कोने में तुम्हें सजा लिया था।
वक़्त की आँधियों ने फिर रुख बदल दिया,
हाथों में था जो कल, उसे कल ने ही छीन लिया।
अब यादों का सहारा है, और तन्हा सी शाम,
दिल मानता नहीं, पर मानता है ये अंजाम।
मोहब्बत शायद अब भी कहीं ज़िंदा है हम में,
बस इज़हार की जगह रह गई है ख़ामोशी के ग़म में।